फरियाद
इस जहाँ में खुशियाँ कहाँ है ?
ग़मों का डेरा जमा है।
हर घडी हर राह पर ,
नफरतों का करवाह है।
एक ज़मीं एक आसमां है ,
सभी जी रहे यहाँ है।
फिर भी न जाने क्या हुआ है ?
हर जगह धुआँ-धुआँ है।
क्या गाऊँ क्या शेहर,
हर कहीं सूना पड़ा है।
मज़हबों के नाम पर,
आदम दरिंदा खड़ा हैं
खुदा अपने बन्दों को,
कुछ तोह रियायत बक्श दे ,
शायद वह भूले बैठे है
की यह उन्ही का जहाँ है।
इस जहाँ में खुशियाँ कहाँ है ?
ग़मों का डेरा जमा है।
हर घडी हर राह पर ,
नफरतों का करवाह है।
एक ज़मीं एक आसमां है ,
सभी जी रहे यहाँ है।
फिर भी न जाने क्या हुआ है ?
हर जगह धुआँ-धुआँ है।
क्या गाऊँ क्या शेहर,
हर कहीं सूना पड़ा है।
मज़हबों के नाम पर,
आदम दरिंदा खड़ा हैं
खुदा अपने बन्दों को,
कुछ तोह रियायत बक्श दे ,
शायद वह भूले बैठे है
की यह उन्ही का जहाँ है।
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